सोमवार, 14 सितंबर 2015

ध्यानयोग की व्याख्या

परम् सत्य जो कि इंद्रियों, मस्तिष्क एवं विवेक के ज्ञान क्षेत्र के परे का स्वत: अस्तित्व है का ध्यान करने और अनुभूति को अपनी धारणा में स्थापित करने के लिये व्यक्ति को इस नश्वर परिवर्तनशील संसार के समस्त सम्बंधों से अपने को अलग करने की अनुशंसा की गुरू ने । मस्तिष्क में संचित पूर्व के सम्बंधों से भी अपनी रक्षा करने की अनुशंसा की गुरू ने । साधना काल में सम्भावित विघ्नों का ध्यान कर गुरु नें इंद्रियों को नियंत्रण में करने की वाँक्षना बतायी है । 

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