भगवद्गीता में वर्णित गुरू योगेश्वर
श्रीकृष्ण के उपदेशों का लक्ष्य है कि प्रत्येक व्यक्ति ब्रम्ह का अनुभव स्वयं कर
सके । सत्य हम सभी के अंत:करण में विद्यमान है । इस सत्य को जानने के लिये हमें
किसी अन्य सत्य की सहायता की आवश्यकता नहीं है । मात्र जो आवरण उस सत्य को ढके
हुये है उसे हटाना है । सत्य को ढकने वाला आवरण असत्य है । यह असत्य हमारे ज्ञेय
क्षेत्र का है । उस असत्य के प्रति हमें भ्रामक मोंह बाँधे हुये है । मोंह इस शरीर
से, मोंह इसके व्यसन से यह सभी नश्वर
है । मृत्यु अपरिहार्य है । परंतु फिर भी हमारे सारे प्रयत्न इसी शरीर के सुख आराम
के लिये ही हैं । यह मोंह कंचिद कटेगा तो सत्य सम्मुख ही मिलेगा ।
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