गुरू द्वारा बताये गये योगाभ्यास को व्यक्त करने में भगवद्गीता
के अज्ञात् ग्रंथकार ने इस शब्द का प्रयोग किया है- यतचित्तात्मा । चित् अर्थात
स्मृति आत्मा और स्मृति एकीकृत । मानसिक एकाग्रता का विचलन स्मृति से प्रारम्भ
होता है । इसलिये गुरू ने कहा कि ब्रम्ह के चिंतन काल में मानसिक एकाग्रता को
बनाये रखने के लिये जिज्ञासु साधक को चित्त को आत्मा के नियंत्रण में रखना होगा ।
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