बुधवार, 16 सितंबर 2015

विद्वानो का मत : 1

विद्वान सत्यदर्शी दार्शनिक पाइथागोरस से यह पूँछे जाने पर कि आप अपने को दार्शनिक क्यों कहते हैं के उत्तर में उन्होने एक दृष्टांत के माध्यम से अपने को व्यक्त किया था । उन्होने कहा कि मनुष्य का जीवन ओलम्पिक खेलों के समान होता है जहाँ पूरे संसार के लोग खेलगाँव एकत्रित होते हैं । कुछ लोग वहाँ व्यवसाय करके आनंदित होते हैं, कुछ स्पर्धाओं की होड में व्यस्त रहते हैं और कुछ लोग मात्र सभी कुछ हो रहे के दृष्टा होते हैं । दार्शनिक उपरोक्त अंतिम श्रेणी का होता है । दार्शनिक अपने को आवश्यकताओं और समस्याओं से परे रखता है । 

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