आत्मा की प्रधानता का जीवन पानेके लिये प्रकृतीय मोंह के जीवन
का त्याग अपरिहार्य आवश्यकता होती है । अभ्यासी का पूर्व का समस्त जीवन प्रकृतीय
मोंह का ही रहा होता है । इसलिये विगत जीवन की स्मृतियों का त्याग । चित्तशुद्धि ।
स्मृतियों के संचय को ही चित्त कहा जाता है । इसी चित्तशुद्धि के लिये ही गुरू ने
उपाय सुझाये, फल की कामना बिना किये कर्म को
करने का अभ्यास, अपने मस्तिष्क और इंद्रियों को
नियंत्रित रखना आदि । प्रकृति आत्मा को चित्त के मार्ग से ही अपने मोंह में आकर्षित
करती है ।
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