मंगलवार, 15 सितंबर 2015

अभ्यास का विस्तार

सर्वोच्च सत्य जिसका अस्तित्व ज्ञान के लिय उपलब्ध इंद्रियों, मस्तिष्क और विवेक की सीमा के परे का है के स्वरूप की धारणा स्थापित करना तथा अनुभव प्राप्त करने का लक्ष्य लेकर किये जा रहे प्रयत्नों में उद्यमी व्यक्ति को अपने अंत:करण में उठने वाली सूक्ष्मतम स्थितियों का अध्ययन करना अपेक्षित होगा । यह अनुभूति क्या होगी इसे निश्चय पूर्वक कोई भी नहीं बता सकता है । यहाँ तक कि अनुभूति होने पर स्वयँ वह व्यक्ति भी नहीं बता सकेगा । परंतु गुरू का कहना है कि इस अभ्यास द्वारा आत्मा जो कि प्रकृतीय मोंह में बँधी हुई है उसे मुक्ति मिलेगी । 

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