धर्म के प्रकरण में हृदय – concept – धारण को कहा जाता है । ज्ञान की ग्राह्यता
सर्वप्रथम धारणा में ही होती है । ब्रम्ह जो कि इंद्रियों, मस्तिष्क और विवेक की सीमा से परे का अस्तित्व होता है उसके
ज्ञान के लिये उसकी धारणा स्थापित करना एक दुर्गम लक्ष्य होता है । इसमें पूर्व के
ज्ञान अथवा अनुभव सहायक नहीं होते हैं । धारणाशून्य स्थिति सहायक हो सकती है ।
ब्रम्ह स्वयं ही जिज्ञासु को अपना अनुभव करा देगा । इसी स्थिति को भक्ति पथ में
विश्वास कहा जाता है ।
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