योगाभ्यासी जब पूर्णतया प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो जाता है, उसका चित्त पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाता है
तो ऐसी दशा प्राप्त होने पर उसे ब्रम्ह का शाश्वत् धर्म ग्राह्य हो जाता है । उसे
सत्य का दर्शन मिलता है । यह शाश्वत् दर्शन, दूषित करने वाले मोंह से मुक्त होने पर ही मिलता है । सत्य का
दर्शन पाने वाला योगी ब्रम्ह की शाश्वत् चिर शांति का भोग करता है । वह कार्य तो
करता है परंतु उसकी आत्मा अविचलित शांति स्थिति में कायम रहती है । इस स्थित का
उदाहरण कमल के पत्ते से दिया जाता है जो पानी में रहते हुये भी पानी से अछूता रहता
है ।
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