शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

एकीकृत

ब्रम्ह के साथ एकीकृत । जीवन के सभी छोटे बडे कार्यों को करने में अपनी आत्मा को ब्रम्ह के साथ एकीकृत रखना योगी का लक्ष्य होता है । कार्यों की कर्ता प्रकृति होती है । कार्यों का प्रेरक आत्मा होती है । आत्मा इंद्रियों, मस्तिष्क, और विवेक के ज्ञेय क्षेत्र से परे होता है । इसलिये आत्मा की यथास्थिति उसके द्वारा प्रेरित कर्म की गुणवत्ता द्वारा ही पता लगती है । यदि आत्मा कार्य के निमित्त तथा कार्य के फल से सम्बंध न रखते हुये मात्र उसके प्रेरण को अपने दायित्व के रूप में सम्बंध रखती है तो उसका आचरण धर्मवत है । यही स्थिति हासिल करने के लिये आत्मा को ब्रम्ह के भाव से एकीकृत रखना योगी का लक्ष्य होता है । इसी का अभ्यास योगाभ्यास है । 

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