व्याख्याकार गुरू द्वारा बताये गये योगाभ्यास विधि का विस्तार
बताते हुये कहता है कि सामान्य जीवन यापन में प्रत्येक व्यक्ति भौतिक सुखों एवं
वासना वस्तुओं को प्राप्त करने एवं संचय करने के प्रयत्नों में व्यस्त रहता है ।
इस व्यस्तता के कारण उसका मस्तिष्क ब्रम्ह के प्रति अचेत दशा में रहता है । इसलिये
गुरू उपदेश किये कि अपने विवेक को ब्रम्ह के ध्यान में केंद्रित करें ।
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