गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो भी मनुष्य मेरे जन्म और कर्म को सही
रूप में जान जाता है उसे उसकी तत्कालीन शरीर की मृत्यु के उपरांत दोबारा जन्म नहीं
लेना होता है अपितु वह आत्मा ब्रम्ह में विलीन हो जाती है । व्याख्याकार उपरोक्त
कथन का भाव स्पष्ट करते हुये कहता है कि अवतार पुरुष श्रीकृष्ण उदाहरण प्रस्तुत
करते हैं कि कोई भी मनुष्य उत्थान करके कैसे ब्रम्ह स्वरूप पर्यंत उन्नति कर सकता
है । अजन्में ब्रम्ह स्वरूप जन्मी हुई आत्मा में कैसे प्रगट हो सकता है यह अवतार
पुरुष श्रीकृष्ण के दर्शन में विदित होता है ।
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