गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मनुष्य के अपने विवेक का निर्णय जिसे वह
कंचिद पूर्णता से ना भी क्रियांवित कर सके अपेक्षाकृत अधिक अच्छा है वनस्पति दूसरे
द्वारा आदेशित निर्णय के जिसे कि वह अधिक पूर्णता से क्रियांवित कर सकता है । अपने
निर्णय को क्रियांवित करने में यदि मनुष्य की मृत्यु भी हो जाय तो भी यह दूसरे के
जोखिम विहीन निर्णय की अपेक्षा अधिक अच्छा है । व्याख्याकार कहता है अपने कर्म
दायित्व का निर्णय अपने विवेक द्वारा ही करना चाहिये । यदि कंचिद विवेक का निर्णय
रुचि के विपरीत है कडुआ है तो भी हमें विवेक के निर्णय पर ही मृत्यु पर्यंत सत्यनिष्ठा
से आचरण करना चाहिये । विवेक ही कर्म की गुणवत्ता का मानक है ।
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