गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि कितने ही मनुष्य जिन्होने अपने को
मनोवेगों से रक्षित कर, भय और क्रोध का त्याग कर,
मेरे प्रति समर्पित भाव से अपने आत्मबोध में संतुष्ट रहकर साधना किया वे सभी परम्
ब्रम्ह में विलीन हो चुके हैं । व्याख्याकार गुरू के उपरोक्त कथन का विस्तार बताते
हुये कहता है कि अवतार का उद्देष्य होता है कि आम मनुष्य को व्यवहारिक जीवन में
उन्नति करने का एक उदाहरण दृष्टि से देखने के पथ से सुलभ हो और जिसके फल से उसे
जीवन के चर्मोत्कर्ष स्थिति को प्राप्त करने का उत्साह जागृत हो । मुक्त आत्मा का
व्यक्ति ही इस संसार में ब्रम्ह के प्रतिनिधि स्वरूप का उदाहरण होता है ।
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