गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि इंद्रियाँ अत्यधिक बलशाली होती हैं,
परंतु उनसे बलशाली मस्तिष्क होता है, उससे भी बलशाली विवेक होता है,
और विवेक से भी बलशाली आत्मा होती है । व्याख्याकार उपरोक्त कथन के संदर्भ से बताता
है कि उत्थान की जागृति क्रमबद्ध होती है । हम जितना ही जागृत होंगे उतना ही मुक्त
दशा पायेगें । यदि हम इंद्रीय वासनाओं के वशीभूत कार्य करेगें तो बंधन में रहेंगे
। उच्चतम स्वतंत्रता का स्तर तब मिलेगा जब हमारे कृत विवेक के द्वारा पोषित होंगे
और हमारा विवेक आत्मा की अनुभूति से प्रकाशित रहेगा ।
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