गुरुवार, 21 मई 2015

साक्षात् उपस्थित

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जब जब सामाजिक व्यवस्था में धर्म का पतन होता है, और अधर्म का विस्तार बढ जाता है, तब तब मैं अपने को प्रगट रूप में उपस्थित करता हूँ । व्याख्याकार कहता है कि ब्रम्ह अपनी स्थापित व्यवस्था का संतुलन बिगडते देखते हैं तो वह मूक दृष्टा ही नहीं बने रहते हैं बल्कि वह किसी रूप में स्वयँ उपस्थित होकर अधर्म को नियंत्रित कर धर्म का साम्राज्य स्थापित करते हैं । 

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