व्याख्याकार
ब्रम्ह को किसी रूप विषेस में इस रूप संसार में प्रगट होने का उद्देष्य बताते हुये
कहता है कि मानव समाज के तत्कालीन जीवन स्तर से उन्नति करके एक उच्चस्तरीय जीवन
पद्धति में जिसमें प्रेम, शांति और परस्पर सद्भाव का वर्चस्व होता
है पर्यंत उन्नति करने के लिये ब्रम्ह स्वयं अपने को किसी रूप में प्रगट करता है ।
उसका यह प्रगट रूप अन्य के लिये एक उदाहरण बनता है । धर्म अधर्म को परास्त करता है,
सत्य असत्य को पराजित करता है, मृत्यु-रोग-पाप की वृत्तियों का दमन
होता है और सत्य-विवेक-आनंद की वृत्तियों का वर्चस्व स्थापित होता है ।
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