गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुरूप
कार्य करते हैं । प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुरूप कार्य करता है । मनुष्य
की रुचिंयाँ अपने को कर्म में व्यक्त करती हैं । व्याख्याकार उपरोक्त कथन को
स्पष्ट करते हुये कहता है कि प्रत्येक मनुष्य का जन्म एक मस्तिष्क के साथ हुआ है
जिसका संचालन प्रकृति करती है । इस यंत्र की गुणवत्ता उसके पूर्व जन्म के कर्मों
के अनुरूप रहती है । इसके क्रिया सम्पादन को भगवान भी नहीं रोक सकते हैं । इस
यंत्र का संचालन प्रकृति की सतत् चलने वाली प्रक्रिया करती है इसलिये इसमें कोई
विघ्न भी सम्भव नहीं होता है । आत्मा मात्र दृष्टा होती है । इससे व्यक्त होता है
कि प्रकृति अति शक्तिशाली व्यवस्था है जो आत्मा को अपनी योजना के अनुरूप कार्य
करने को बाध्य करती है । यही जीव के अस्तित्व का नियम भी है । यह गुरू का कथन
आह्वाहन करता है कि हम अपने सत्य प्रकृति को जाने तथा तद्नुसार अपने सत्य स्वरूप
में अपने को प्रस्तुत करें ।
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