बुधवार, 6 मई 2015

प्रकृति और दायित्व : चरण 1

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुरूप कार्य करते हैं । प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुरूप कार्य करता है । मनुष्य की रुचिंयाँ अपने को कर्म में व्यक्त करती हैं । व्याख्याकार उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये कहता है कि प्रत्येक मनुष्य का जन्म एक मस्तिष्क के साथ हुआ है जिसका संचालन प्रकृति करती है । इस यंत्र की गुणवत्ता उसके पूर्व जन्म के कर्मों के अनुरूप रहती है । इसके क्रिया सम्पादन को भगवान भी नहीं रोक सकते हैं । इस यंत्र का संचालन प्रकृति की सतत् चलने वाली प्रक्रिया करती है इसलिये इसमें कोई विघ्न भी सम्भव नहीं होता है । आत्मा मात्र दृष्टा होती है । इससे व्यक्त होता है कि प्रकृति अति शक्तिशाली व्यवस्था है जो आत्मा को अपनी योजना के अनुरूप कार्य करने को बाध्य करती है । यही जीव के अस्तित्व का नियम भी है । यह गुरू का कथन आह्वाहन करता है कि हम अपने सत्य प्रकृति को जाने तथा तद्नुसार अपने सत्य स्वरूप में अपने को प्रस्तुत करें । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें