गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि प्रत्येक इंद्री को,
उसकी वासना वस्तु के प्रति, कुछ रुचियाँ और कुछ अरुचियाँ होती हैं
। प्रकृति के संचालन द्वारा मनुष्य इन्ही रुचियों और अरुचियों के सीमा में आचरण
करता है । व्याख्याकार गुरू के कथन की व्याख्या करते हुये कहता है कि हमें अपने
विवेक के द्वारा इन रुचियों और अरुचियों के क्रियांवन में हस्तक्षेप करना चाहिये ।
यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हमारे कृत पूर्णतया भावुकता द्वारा संचालित होंगे ।
हमारी रुचियाँ और अरुचियाँ ही हमारा स्वरूप बन जावेगीं । जब तक हम कोई कार्य करते
हैं इसलिये कि वह करना हमें प्रिय लगता है अथवा कोई कार्य हम नहीं करते इसलिये कि
हमें वह कार्य करना हमें अप्रिय लगता है तब तक हमारे कर्म बंधनकारी होंगे । परंतु
यदि हम इन रुचियों और अरुचियों को अपने विवेक द्वारा नियंत्रित कर सकें और कर्म को
दायित्व के बोध और वाँक्षनानुसार करें तो हम प्रकृति के खिलौने नहीं रह जावेंगे ।
मनुष्य की स्वतंत्रता विवेक के प्रयोग के अधीन होती है । प्रकृति की दासता बाध्यता
नहीं है ।
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