मनुष्य
शरीर में ब्रम्ह की उच्चतर अपरिवर्तनीय प्रकृति आत्मा । मनुष्य के अंदर विद्यमान
परम् सत्य का अविनाशी अंश । धर्म इस अविनाशी अंश आत्मा का आचरण निर्धारित करता है ।
धर्म व्यक्त करता है कि आत्मा अपने मौलिक स्वरूप में कैसा आचरण करेगा । प्रत्येक
मनुष्य यदि अपनी प्रकृति के अनुरूप आचरण करता है तो उसका धर्मवत् आचरण है । इसके
विपरीत यदि मनुष्य अपने मौलिक प्रकृति के विपरीत आचरण करता है तो अ-धर्मवत्
आचरण है । धर्मवत् आचरण से सामाजिक सद्भाव सृजित होता है और अधर्मवत् आचरण से
सामजिक कलह उत्पन्न होता है । जब मनुष्य समुदाय अपनी चुनाव की स्वतंत्रता का
दुरुपयोग करके सामाजिक कलह की स्थिति उत्पन्न कर लेता है तो ऐसी दशा से समाज को संकट से उबारने के लिये ब्रम्ह स्वयँ प्रगट
होता है ।
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