गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि आत्मा का सत्य मौलिक स्वरूप शाश्वत्
ब्रम्हरूप होता है जो कि अपने सत्य आचरण के लिये सचेत होता है
। परंतु जब आत्मा अपने आचरण के प्रति अचेत होकर प्रकृति के गुणों से मोहित होकर
इच्छाजनित कर्मों को प्रेरित करने को उद्यत हो जाता है तो आत्मा का यह अहंकारी
स्वरूप उसे प्रकृति का दास बना देता है । सच्चे स्वरूप में आत्मा किसी कर्म का
कर्ता नहीं होता है ।
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