गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि यद्यपि कि मैं अजन्मा हूँ,
अक्षर हूँ,
सभी रूपों का आधार हूँ, फिरभी मैं अपने को अपनी प्रकृति में
अपनी माया शक्ति द्वारा स्थापित करता हूँ । व्याख्याकार उपरोक्त कथन को स्पष्ट
करते हुये कहता है कि सामान्य जीव प्रकृति के प्रभाव से जन्म पाता है परन्तु
ब्रम्ह अपनी स्वतंत्र इच्छा से रूप धारण करता है ।
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