गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को प्राचीन उपदेश बताते हुये उपदेश की प्राचीन घोषणा का
इतिहास बताते हैं कि मैंने इसे पूर्व समय में विवस्वान को बताया विवस्वान ने इसे
मनु को बताया मनु ने इसे इक्छवाकु को बताया था । पुन: यह उपदेश समय के साथ लुप्त
हो गया था । अब मैं इसे तुम्हे बता रहा हूँ । व्याख्याकार उपरोक्त कथन में लुप्त
होने वाली दशा के सम्बंध में बताता है कि कोई भी उपदेश तब तक सार्थक होता है जब तक
कोई भी व्यक्ति उसका अनुसरण कर वह सार्थक अनुभव हासिल कर सके एवं मस्तिष्क में
उसकी पावनता की अनुभूति कर सके जिसे वह उपदेश संचरित करता है । जब ऐसा नहीं होता
है तब किसी युगप्रवर्तक अवतार पुरुष का प्रादुर्भाव होता है जो कि उस उपदेश एवं
उससे जनित होने वाली पावन अनुभूति को नवजीवन प्रदान करता है ।
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