शुक्रवार, 29 मई 2015

सर्व प्रकार से

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से बताये कि जो भक्त मुझे जिसभी पथ से पाने की चेष्टा करता है मैं उसे उसी पथ से मिलता हूँ । व्याख्याकार गुरू के उपरोक्त कथन का विस्तार बताते हुये कहता है कि जो व्यक्ति मूर्ति आकार को भगवान मानकर पूजा करता है उसे भगवान उसी मूर्ति आकार के रूप में ही मिलते हैं । ब्रम्ह निराकार अचिंत्य है । इस प्रकार कोई भी मूर्ति आकार ब्रम्ह की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती है । फिरभी कोई मनुष्य बिना किसी सहारे के अचिंत्य का ध्यान नहीं कर सकता है इसलिये मूर्ति आकारों का भी महत्व है । मुख्य बात यह होती है कि कोई व्यक्ति परम् सत्य को जानने के लिये और उस परम् सत्य को पाने के लिये कितना जिज्ञासु है उसी जिज्ञासा की पूर्ति भगवान करते हैं । 

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