गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न के
उत्तर में कहते हैं कि मनुष्य की इच्छायें और क्रोध उसके ज्ञान प्राप्ति के
प्रयत्नों में शत्रु के समान आचरण करने वाले होते हैं । व्याख्याकार कहता है कि
मनुष्य की प्रकृति अपनी रचना के अनुरूप रुचियों और अरुचियों के माध्यम से मनुष्य
से कार्य करा लेती है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें