विगत
अंकों में कर्म करने की विधि के सम्बंध में निष्कर्म, यज्ञ स्वरूप कर्म,
तथा आत्मबोध शीर्षकों में जितने भी वृतांत प्रस्तुत किये गये हैं उनमें उभयनिष्ठ
रूप से जो बाते विद्यमान हैं (1) समस्त रूप संसार के प्रत्येक रूप में एक एकल सत्य
ब्रम्ह विद्यमान है (2) प्रकृति ब्रम्ह की रचना है जिसकी उत्पत्ति ब्रम्ह के
विज्ञान द्वारा सम्भव हुई है (3) समस्त कर्मों का प्रेरक स्वयँ ब्रम्ह है (4)
समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति है । इन तथ्यों को मस्तिष्क में विधिवत् धारण करने
पर मोंह और अहंकार स्वत: की अनुभूति में एक भ्रमके समान लगने लगेगा । इन प्रकृति
निर्मित रूपों की रचागत कमी होती है कि जन्म से ही वह मोंह और अहंकार को अपनी
धरोहर के रूप में मानने लगता है । इन्ही भ्रमकारी दोषों के निवारण के लिये ही
समस्त कर्म करने के सही उपाय सुझाये गये हैं ।
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