सोमवार, 4 मई 2015

द्वैत की सत्य क्षवि

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो पुरुष आत्मा का शुद्ध मौलिक स्वरूप तथा गुणात्मक प्रकृति और उसके गुणों द्वारा किये जा रहे कर्मों का स्पष्ट भेद अच्छे से देखते रहते हैं वे पुरुष समस्त कर्मों को होते देख यह पाते हैं कि प्रकृति के गुण गुणों पर कैसे प्रभाव डाल सारे कार्य कर रहे हैं । सच्चे स्वरूप में आत्मा कर्मों की मात्र दृष्टा होती है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें