बुधवार, 20 मई 2015

प्रकृतिम अधिष्ठाय

अपनी प्रकृति में अपने को स्थापित करना । ब्रम्ह अपने को रूप मे प्रगट करने के लिये अपनी प्रकृति को इस प्रकार से प्रयोग करते हैं कि वह कर्म के बंधन से मुक्त रहे । इस कथन से स्पष्ट होता है कि रूप मात्र दिखावा नहीं होता है । रूप का सृजन किसी निर्धारित प्रयोजन से होता है । यह ब्रम्ह की माया शक्ति होती है जो असम्भव को सम्भव बनाती है । ब्रम्ह रूप धारण करता है । योगमाया ब्रम्ह के स्वतंत्र विचार को कहा गया है । इस योगमाया द्वारा ब्रम्ह जो कि सत्य अस्तित्व है वह असत्य प्रकृति में अपने को प्रगट करता है, ब्रम्ह जो कि सर्वोच्च अस्तित्व है वह सीमित प्रकृति में प्रगट होता है, ब्रम्ह जो कि सर्व शक्तिमान है वह कमजोर में प्रगट  होता है । यह समस्त ऐसी स्थितियाँ हैं जोकि इस संसार के लिये ज्ञेय सत्य हैं । 

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