मंगलवार, 5 मई 2015

कर्म विधि

आत्मा का सत्य मौलिक रूप, प्रकृति और उसके गुण, कर्ता तथा दृष्टा समस्त बताने के उपरांत अर्जुन को उपरोक्त सभी ज्ञान को कर्म में चरितार्थ करने की विधि सुझाते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन तुम अपने समस्त कर्मों को मुझे अर्पित करके, मात्र अपने अहंकार और इच्छा को नियंत्रण में रखते हुये, कार्य करो । व्याख्याकार गुरू के उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये कहता है कि मनुष्य इसी सही के चुनाव में ही तो धोखा खाता है । अपनी इच्छा के कर्मों को वह दायित्व के कर्म मान बैठता है । इसलिये योगेश्वर बताये कि कर्मों को मुझे अर्पित करो । अर्थात् चुनाव भी मुझपर छोड दो । यही विश्वास का स्थल होता है । फिर यदि ईश्वर रोके तो रुकना भी चाहिये । यही स्थिति सही और गलत का भेद उत्पन्न करती है । 

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