व्याख्याकार
कहता है कि इच्छा पूर्ति का प्रयत्न उसकी भोग वस्तु के सेवन द्वारा कभी भी सफल
नहीं होता है । उल्टे इच्छा और बढ जाती है । जिसके पास जितना ही अधिक धन है उसको
उतनी ही अधिक और धन की कामना भी होती है । इच्छा का शमन इच्छा ना करने द्वारा ही
सम्भव हो सकता है । हम जब तक नश्वर की कामना करेंगे तब तक मात्र कलह,
त्रास,
और मानसिक अशांति ही पायेंगे ।
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