गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जिस प्रकार अग्नि धूआँ से ढका हुआ रहता है,
जिस प्रकार दर्पण धूल से ढक जाता है, जिस प्रकार जीव भ्रूण अवस्था में गर्भ
से ढका हुआ रहता है उसी प्रकार ज्ञान मोंह से ढका हुआ रहता है । व्याख्याकार कहता
है ज्ञान को ढकने वाली होती
है मनुष्य की इच्छा । इस इच्छा की अग्नि कभी भी शांत नहीं होती है । इच्छा की
पूर्ति उसके भोग वस्तु से कभी भी सम्भव नहीं होती है ।
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