गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इच्छा रूपी शत्रु के संहार का उपाय बताते हुये
कहा कि आत्मबोध जो विवेक के भी परे होता है को धारणकर इस आत्मबोध के द्वारा शरीर
की प्रकृति को नियंत्रित करके हे अर्जुन इच्छा रूपी शत्रु पर निर्मम प्रहार करो
जिससे उसका पूर्ण संहार सम्भव होगा क्योंकि यह शत्रु अत्यधिक बलशाली होता है ।
इस
उपदेश के साथ भागवद्गीता का कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें